नमाज की इजाजत खत्म… जानिए भोजशाला केस में हाई कोर्ट ने क्या कहा?

मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहे सालों पुराने विवाद में शुक्रवार (15 मई) को एक ऐसा बड़ा मोड़ आया, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा फैसला सुनाते हुए हिंदू समुदाय की दो जनहित याचिकाएं मंजूर कर ली हैं। कोर्ट के इस फैसले ने न सिर्फ इस मध्यकालीन स्मारक की तस्वीर साफ कर दी है, बल्कि पिछले दो दशकों से चली आ रही एक व्यवस्था को भी पूरी तरह से पलट दिया है।

23 साल पुराना एएसआई का आदेश रद्द

हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

‘‘भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद के विवादित परिसर का धार्मिक चरित्र वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में तय किया जाता है.’’

इसके साथ ही अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिमों को हर शुक्रवार भोजशाला परिसर में नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी। अब नई व्यवस्था के तहत यह अधिकार समाप्त हो गया है।

राजा भोज से जुड़ा है स्मारक का इतिहास

अदालत ने यह फैसला हवा-हवाई दावों पर नहीं, बल्कि पुख्ता सबूतों के आधार पर सुनाया है। खंडपीठ ने विवादित स्मारक में एएसआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य दस्तावेजों का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह ऐतिहासिक स्मारक परमार राजवंश के राजा भोज से जुड़ा था, जिससे इसका धार्मिक चरित्र साफ तौर पर देवी सरस्वती के मंदिर के रूप में स्थापित होता है।

मुस्लिम पक्ष के लिए कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने फैसले में एक और महत्वपूर्ण बात जोड़ी है। खंडपीठ ने कहा कि अगर धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी जिले में नई मस्जिद बनाने के लिए जमीन आवंटन की अर्जी देती है, तो राज्य सरकार इस पर कानूनी प्रावधानों के मुताबिक विचार कर सकती है। यानी मुस्लिम पक्ष के लिए मस्जिद बनाने का रास्ता अलग जगह पर खुला रखा गया है।

हजारों दस्तावेजों और तीन समुदायों की दलीलों पर मंथन

आपको बता दें कि हाई कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में 6 अप्रैल से नियमित सुनवाई शुरू की थी और सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद 12 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले की जटिलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोर्ट के सामने हजारों ऐतिहासिक दस्तावेज, अलग-अलग धार्मिक विश्वास और कानूनी दावों की परतें थीं।

सुनवाई के दौरान सिर्फ हिंदू और मुस्लिम ही नहीं, बल्कि जैन समुदाय के याचिकाकर्ताओं ने भी अपनी विस्तृत दलीलें पेश की थीं और इस एएसआई संरक्षित स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा था।

क्या था 2003 का वह नियम, जो अब इतिहास बन गया?

भोजशाला को लेकर जब विवाद गहराया था, तब एएसआई ने 7 अप्रैल 2003 को एक व्यवस्था बनाई थी। इसके तहत हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार को भोजशाला में पूजा करने की अनुमति थी, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार को नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी। पिछले 23 सालों से यही व्यवस्था चली आ रही थी, जिसे अब हाई कोर्ट के इस बड़े फैसले ने हमेशा के लिए बदल दिया है।

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