ब्रिटिश काल के 113 साल पुराने दिल्ली जिमखाना क्लब की पूरी कहानी

प्रधानमंत्री आवास के ठीक पीछे, लुटियंस दिल्ली के दिल (सफदरजंग रोड) में बसा \’दिल्ली जिमखाना क्लब\’ एक बार फिर देश की सबसे बड़ी सुर्खियों में है। केंद्र सरकार ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए इस आलीशान और वीआईपी क्लब की जमीन पर कब्जा करने का आदेश जारी कर दिया है।

लीज दस्तावेज की धारा 4 (Section 4) का हवाला देते हुए सरकार ने साफ कर दिया है कि देश की सुरक्षा और डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए इस 27.3 एकड़ की बेशकीमती जमीन की जरूरत है। 5 जून 2026 तक अगर यह जमीन नहीं सौंपी गई, तो पुलिस बल का इस्तेमाल किया जाएगा।

आइए समझते हैं कि आखिर इस क्लब का इतिहास क्या है, इसके बंद दरवाजों के पीछे अमीरों का कैसा साम्राज्य चलता है और सरकार को यह कड़ा कदम क्यों उठाना पड़ा।

बात साल 1911 की है, जब अंग्रेजों ने भारत की राजधानी को कलकत्ता (अब कोलकाता) से दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला किया। नई दिल्ली (लुटियंस दिल्ली) को बसाने की तैयारी चल रही थी। इसी दौरान ब्रिटिश अधिकारियों और राजा-महाराजाओं के मनोरंजन के लिए एक आलीशान जगह की जरूरत महसूस हुई।

3 जुलाई 1913 को इसकी शुरुआत \’इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब\’ के रूप में हुई। 947 में देश आजाद हुआ, तो इसके नाम से \’इंपीरियल\’ शब्द हटा दिया गया और यह बन गया \’दिल्ली जिमखाना क्लब\’। आजादी के बाद अंग्रेजों की जगह देश के बड़े ब्यूरोक्रेट्स, सेना के बड़े अधिकारियों, राजनेताओं और उद्योगपतियों ने ले ली। यह सत्ता के गलियारों का सबसे बड़ा \’स्टेटस सिंबल\’ बन गया।

यह कोई आम क्लब नहीं है, बल्कि देश के एलीट (Super Rich) क्लास का एक ऐसा गढ़ है जहां आम आदमी झांक भी नहीं सकता। इसके रसूख का अंदाजा आप इन बातों से लगा सकते हैं। इस क्लब का मेंबर बनने के लिए 7 लाख रुपये से लेकर 18 लाख रुपये तक की मोटी रकम चुकानी पड़ती है।

अगर आपके पास पैसा है, तब भी आप सीधे मेंबर नहीं बन सकते। क्लब की मेंबरशिप के लिए 36 साल लंबी वेटिंग लिस्ट चलती है। यानी आज आवेदन करेंगे, तो शायद अगली पीढ़ी को सदस्यता मिले! आरोप लगते रहे हैं कि यहाँ मेंबरशिप पैसों से ज्यादा \’ऊंची सिफारिशों\’ और भाई-भतीजावाद (Nepotism) से तय होती थी।

27 एकड़ में फैले इस क्लब में वर्ल्ड-क्लास लॉन टेनिस कोर्ट्स, रैकेट कोर्ट्स, शानदार रेस्टोरेंट्स, आलीशान लाउंज और कमरों की बुकिंग जैसी सुविधाएं हैं। पीएम आवास के ठीक पीछे होने के कारण यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता और बाहर भारी पुलिस फोर्स तैनात रहती है। सरकार की इस क्लब पर नजर अचानक नहीं पड़ी है। इसकी पटकथा 2020 में ही लिखी जा चुकी थी।

करीब 5 साल पहले केंद्र सरकार ने जांच में पाया कि क्लब के अंदर भारी वित्तीय गड़बड़ियां हो रही हैं। सरकार का आरोप था कि यह क्लब कुछ खास परिवारों और रसूखदारों का \’प्राइवेट लिमिटेड साम्राज्य\’ बन चुका है। नियमों को ताक पर रखकर मेंबर चुने जा रहे हैं इसी के चलते पिछले 5 सालों से नई मेंबरशिप देने पर पूरी तरह रोक लगी हुई है।

कभी ब्रिटिश हुकूमत के \’गोरे साहबों\’ की ऐशगाह रहा यह क्लब आजादी के बाद भारतीय एलीट क्लास का गढ़ बना। लेकिन अब, नेशनल सिक्योरिटी और पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर सरकार इस 113 साल पुराने इतिहास को अपने नियंत्रण में लेने जा रही है। 5 जून के बाद लुटियंस दिल्ली का यह नजारा हमेशा के लिए बदल जाएगा।

Scroll to Top