यह बंगाल की राजनीति का वह रोमांचक मोड़ है जहाँ कल का ‘रक्षक’ आज का सबसे बड़ा ‘चुनौती देने वाला’ बन चुका है। ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी की यह कहानी केवल दल-बदल की नहीं, बल्कि बंगाल की सत्ता के उस शतरंज की है जहाँ मोहरे अब पलटने लगे हैं। आईये आज आपको बंगाल चुनाव पर एक और कहानी से रूबरू कराते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है—”जो नंदीग्राम जीतेगा, वही बंगाल जीतेगा।” कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सेनापति रहे शुभेंदु अधिकारी ने 2021 में इसी नंदीग्राम में ममता को हराकर यह साबित कर दिया कि वो दीदी की रणनीति की हर नब्ज से वाकिफ हैं। आज स्थिति यह है कि ममता के लिए चुनौती दिल्ली की बीजेपी नहीं, बल्कि बंगाल की गलियों में उन्हीं के दांव को उन्हीं पर आजमाने वाले शुभेंदु अधिकारी हैं।
एक दौर था जब ममता बनर्जी सड़कों पर वामपंथी ‘लाल झंडे’ के खिलाफ आवाज बुलंद करती थीं, तो शुभेंदु अधिकारी एक ढाल बनकर उनके साथ खड़े रहते थे। 2007 का नंदीग्राम आंदोलन हो या सिंगूर की लड़ाई, शुभेंदु टीएमसी के किले के वो सबसे मजबूत स्तंभ थे जिन्होंने ज़मीनी स्तर पर पार्टी को ताकत दी। लेकिन आज वही ‘चाणक्य’ ममता के साम्राज्य को ढहाने के लिए चक्रव्यूह रच रहा है।
राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे बड़ी चर्चा 77 के जादुई आंकड़े की है। सूत्रों के दावों के अनुसार ममता बनर्जी के मौजूदा 212 विधायकों में से लगभग 77 विधायक बीजेपी के संपर्क में बताए जा रहे हैं। अगर ये विधायक बिना शर्त पाला बदलते हैं, तो बीजेपी की मौजूदा 77 सीटों के साथ मिलकर यह आंकड़ा 154 तक पहुँच सकता है, जो बहुमत (148) से कहीं ज्यादा है।
शुभेंदु अधिकारी को दिल्ली से ‘फ्री हैंड’ मिला हुआ है। साम, दाम, दंड, भेद—लक्ष्य सिर्फ एक है…2026 में बंगाल को ‘भगवामय’ करना।
बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने यह समझ लिया है कि बंगाल में ममता को हराने के लिए किसी बाहरी चेहरे से ज्यादा एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो टीएमसी के संगठन की कमजोरी जानता हो। आईये ग्राफिक्स के जरिए आपको समझाते हैं कैसे शुभेंदु को मिली पूरी पावर इसी ओर इशारा करती है:
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नेताओं की घर वापसी: टीएमसी के नाराज गुट को साथ जोड़ना।
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दिल्ली से सीधा संवाद: हर बड़े फैसले के लिए शुभेंदु को दिल्ली से हरी झंडी मिलना।
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संगठन पर पकड़: टीएमसी का एक बड़ा धड़ा अब शुभेंदु को ही अपना स्वाभाविक नेता मानने लगा है।
बंगाल का इतिहास गवाह है कि यहाँ सत्ता आसानी से नहीं बदलती, लेकिन जब बदलती है तो बड़े धमाके के साथ। अगर शुभेंदु अधिकारी टीएमसी के विधायकों को तोड़ने में सफल रहते हैं, तो यह न केवल ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे कठिन चुनाव होगा, बल्कि बंगाल के दशकों पुराने ट्रेंड को भी बदल देगा।
दीदी की ताकत उनका संगठन था, और अब उसी संगठन के ‘असली सूत्रधार’ रहे शुभेंदु अधिकारी उसे जड़ों से हिलाने में जुटे हैं। 2026 का चुनाव महज़ एक चुनाव नहीं, बल्कि दो ऐसी शख्सियतों की जंग है जो एक-दूसरे की रग-रग से वाकिफ हैं।
