लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन बिल को लेकर मचे घमासान ने देश में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर संसद में संख्याबल और नीति पर तकरार जारी है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक एक ही सवाल गूंज रहा है— महिलाओं को नेतृत्व देने में कौन सी पार्टी सबसे आगे रही है?
भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्ने पलटें तो यह मुकाबला दिलचस्प नजर आता है। आइए देखते हैं कि ‘आधी आबादी’ को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में कांग्रेस, भाजपा और क्षेत्रीय दलों का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है। भारत के इतिहास में महिलाओं को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की शुरुआत कांग्रेस के दौर में हुई।
सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश, 1963): कांग्रेस ने देश को पहली महिला मुख्यमंत्री देकर इतिहास रचा। यह न केवल यूपी बल्कि पूरे देश के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। उसके बाद नंदिनी सत्पथी ने ओडिशा की कमान संभाली।
सैयदा अनवरा तैमूर ने असम की मुख्यमंत्री बनकर देश की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल किया। वहीं राजिंदर कौर भट्टल ने भी पंजाब में महिला नेतृत्व की बाधाओं को तोड़ा। इसके साथ ही शीला दीक्षित जो दिल्ली में 15 साल के शासन के साथ भारत की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
कांग्रेस के बाद भाजपा ने महिला नेतृत्व को न केवल अपनाया बल्कि उसे चुनावी जीत के ‘ब्रांड’ के रूप में स्थापित किया। सुषमा स्वराज को 1998 में दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा के लिए यह सिलसिला शुरू किया। उसके बाद उमा भारती ने मध्य प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनकर ‘ओबीसी’ और ‘महिला’ कार्ड का सफल मेल दिखाया।
इतना ही नहीं वसुंधरा राजे ने भी राजस्थान की पहली महिला सीएम बनीं और दो कार्यकालों तक दबदबा बनाए रखा। वहीं आनंदीबेन पटेल ने भी पीएम मोदी के बाद गुजरात की कमान संभालकर पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में नया कीर्तिमान बनाया।
| मुख्यमंत्री | राज्य | पार्टी | विशेष उपलब्धि |
| ममता बनर्जी | पश्चिम बंगाल | TMC | राज्य की पहली महिला CM और वर्तमान में सबसे कद्दावर नेता। |
| मायावती | उत्तर प्रदेश | BSP | भारत की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री। |
| जे जयललिता | तमिलनाडु | AIADMK | दशकों तक दक्षिण की राजनीति पर एकछत्र राज। |
| महबूबा मुफ्ती | जम्मू-कश्मीर | PDP | राज्य की पहली और एकमात्र महिला मुख्यमंत्री। |
अगर ‘प्रथम’ होने की बात करें, तो कांग्रेस ने नींव रखी। लेकिन अगर ‘विस्तार और प्रभाव’ को देखें, तो भाजपा और क्षेत्रीय दलों ने इसे जन-आंदोलन और वोट बैंक की ताकत में तब्दील कर दिया। महिला आरक्षण बिल फेल होने को लेकर आज जब देश में ‘तूफान’ उठा है, तो यह आंकड़े बताते हैं कि भारतीय राजनीति में महिलाओं ने अपनी जगह मांगने के बजाय अपनी काबिलियत से छीनी है।