भारत की आर्थिक कहानी में दो बड़े बजट 1991 और 2005

जबसे देश आजाद हुआ है, तब से हर साल बजट पेश किए जाने की परंपरा रही है। इस साल भी बजट एक फरवरी को पेश किया जाएगा जो कि रविवार का दिन है। उस दिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में सुबह 11 बजट पेश करेंगी। आईये आपको बताते देश के कुछ ऐतिहासिक बजट के बारे में।

यह बात वर्ष 1991 के दौर की है, जब देश बहुत मुश्किल हालत में फंस गया था। देश की तिजोरी में बस कुछ ही सोने-चांदी के सिक्के बचे थे मतलब विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि दो हफ्ते भी आयात नहीं हो सकता था। बाहर से कर्ज ले-लेकर हालत और बिगड़ गई थी। महंगाई आसमान छू रही थी। लोग कहते थे, “अब तो देश दिवालिया होने वाला है!” देश के बड़े घराने चिंतित थे। नेहरू के जमाने से चला आ रहा लाइसेंस राज जैसे एक सख्त पहरेदार की तरह हर काम में अड़ंगा डाल रहा था। कोई नई फैक्ट्री लगानी हो, कोई बड़ा कारोबार शुरू करना हो—सरकार से दर्जनों परमिशन लेनी पड़ती थीं। बाहर की दुनिया से व्यापार करना मुश्किल था। आयात पर इतना भारी टैक्स कि विदेशी सामान सपने में भी नहीं आता था।
तभी देश को एक दूरदर्शी सोच वाला नेता मिला—डॉ. मनमोहन सिंह, जो पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके थे। 21 जून 1991 को उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने कहा, “अब कुछ बड़ा करना होगा, वरना घर उजड़ जाएगा।” 24 जुलाई 1991 को मनमोहन सिंह संसद में खड़े हुए। सबकी सांसें थम गईं। उन्होंने बजट पेश किया और कहा “भाइयों-बहनों, आज हमारा देश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं—हम डरने वाले नहीं हैं। हम सोने की चिड़िया को फिर से उड़ान भरने देंगे!”
उन्होंने तुरंत बड़े-बड़े ताले तोड़ दिए:
  • लाइसेंस राज को ज्यादातर सेक्टरों से खत्म कर दिया। अब कोई भी भारतीय या विदेशी कंपनी आसानी से फैक्ट्री लगा सकती थी।
  • आयात-निर्यात के रास्ते खोल दिए। टैक्स कम किए, ताकि दुनिया से सामान आ-जा सके।
  • बड़े-बड़े सेक्टर—टेलीकॉम, बिजली, बैंकिंग, बीमा—सबमें निजी कंपनियों और विदेशी निवेश को बुलावा दे दिया।

ये था उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का जन्म। जैसे किसी ने पुराने, तंग घर के सारे दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं। हवा आई, रोशनी आई। पहले तो लोग डरे, लेकिन धीरे-धीरे कारखाने लगे, नौकरियां बढ़ीं, मोबाइल फोन आए, कंप्यूटर आए, विदेशी कंपनियां आईं। भारत की अर्थव्यवस्था ने नई उड़ान भरी। आज हम जिस भारत को देखते हैं—आईटी हब, कारों की बाढ़, शॉपिंग मॉल—उसकी नींव इसी 1991 के क्रांतिकारी बजट में पड़ी थी।

फिर समय बीता। साल 2005 आया। अब देश थोड़ा संभल चुका था। अमीर बन रहा था, लेकिन गांवों में अभी भी गरीबी, बेरोजगारी और पलायन की मार थी। शहरों की चमक गांवों तक नहीं पहुंच रही थी। तब वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने 28 फरवरी 2005 को बजट पेश किया। उन्होंने इसे आम आदमी का बजट कहा। जैसे परिवार के मुखिया ने कहा हो—”अब सिर्फ बड़े-बड़ों की नहीं, हर छोटे-छोटे सदस्य की सुनेंगे।”

आईये आपको बताते हैं उन्होंने क्या-क्या किया?

  • कंपनियों पर टैक्स कम किया, ताकि वे और तेज बढ़ें और नौकरियां दें।
  • कस्टम ड्यूटी घटाई, सामान सस्ता हुआ।
  • सबसे बड़ी घोषणा की—मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) लाने की। हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन का गारंटीड काम मिलेगा, न्यूनतम मजदूरी पर।
  • आरटीआई (सूचना का अधिकार) कानून लाने की बात की, ताकि आम आदमी सरकार से पूछ सके—”हमारा पैसा कहां जा रहा है?”

मनरेगा से गांवों में लोग शहर पलायन करने की बजाय अपने घर-खेतों के पास ही काम करने लगे। हाथों में काम, जेब में पैसे, घर में चूल्हा जलने लगा। आरटीआई ने लोगों को अधिकार दिया—अब वे भ्रष्टाचार पर सवाल उठा सकते थे। ये बजट कॉरपोरेट और आम आदमी—दोनों को साथ लेकर चला। एक तरफ अर्थव्यवस्था को स्पीड दी, दूसरी तरफ गरीब की थाली में रोटी बढ़ाई।

आपको बता दें कि भारत की आर्थिक कहानी में दो बड़े अध्याय हैं:
  • 1991 — जब मनमोहन सिंह ने बंद दरवाजे तोड़े और दुनिया को भारत में बुलाया। क्रांतिकारी बजट, जो देश को कंगाली से बचाकर नई राह पर ले गया।
  • 2005 — जब चिदंबरम ने कहा, “अब विकास सिर्फ शहरों का नहीं, गांवों का भी होगा।” आम आदमी का बजट, जो विकास को inclusive बनाया।

दोनों बजट अलग-अलग दौर के थे, लेकिन दोनों ने भारत को मजबूत, आत्मविश्वासी और समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाई। और आज हम उसी कहानी का हिस्सा हैं! देश के आम नागरिक को इस बार भी आम बजट से उम्मीद है। देखना होगा की आम आदमी की थाली में मोदी सरकार कितने व्यंजन डालती है।

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