एम्स रचने जा रहा है एशिया का पहला फेस ट्रांसप्लांट इतिहास

“सूरत नहीं बदली जा सकती”—यह कहावत अब बीते वक्त की बात लगने वाली है। मेडिकल साइंस की दुनिया में भारत एक नई इबारत लिखने जा रहा है। देश का शीर्ष चिकित्सा संस्थान All India Institute of Medical Sciences (एम्स) दिल्ली एशिया का पहला फेस ट्रांसप्लांट करने की तैयारी में है। अगर यह सर्जरी सफल होती है, तो यह भारतीय चिकित्सा विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शुमार होगी।

एम्स के बर्न विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल के मुताबिक, यह कोई सामान्य ऑपरेशन नहीं, बल्कि मेडिकल साइंस की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में से एक है। सर्जरी 24 से 48 घंटे तक चल सकती है। इस दौरान प्लास्टिक सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, माइक्रोवैस्कुलर सर्जन और कई विशेषज्ञ डॉक्टर एक साथ मिलकर चेहरे की त्वचा, हड्डियां, नसें और मांसपेशियां ट्रांसप्लांट करेंगे। हर मिनट, हर टांका और हर नस—नई जिंदगी की उम्मीद से जुड़ा होगा।

एम्स की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवांगी साहा बताती हैं कि यह सर्जरी उन लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है, जिनका चेहरा एसिड अटैक, गंभीर जलन, गोली लगने या किसी बड़े हादसे में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। कई मामलों में पारंपरिक प्लास्टिक सर्जरी से सुधार संभव नहीं होता। ऐसे में फेस ट्रांसप्लांट ही आखिरी और सबसे प्रभावी विकल्प बनता है। हालांकि, डोनर और रिसीवर का जेंडर समान होना जरूरी है, ताकि चेहरे की बनावट और ऊतकों का बेहतर सामंजस्य हो सके।

एम्स के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. डी. भौमिक के अनुसार, इस प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में “वेस्कुलराइज्ड कंपोजिट एलोग्राफ्ट (VCA)” कहा जाता है। इसमें मृत दाता के चेहरे के ऊतकों—त्वचा, हड्डियां, नसें, रक्त वाहिकाएं और मांसपेशियां—को मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है। यह प्रक्रिया काफी हद तक किडनी ट्रांसप्लांट जैसी होती है। ऑपरेशन के बाद मरीज को जीवनभर ऐसी दवाएं लेनी पड़ सकती हैं, जो शरीर को नए चेहरे को अस्वीकार करने से रोकें।

फेस ट्रांसप्लांट केवल शारीरिक बदलाव नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी बड़ा परिवर्तन है। एम्स के साइकोलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रीति के मुताबिक, मरीज को मानसिक रूप से तैयार करना बेहद जरूरी होता है। उसे ऑपरेशन से पहले और बाद की हर स्थिति के बारे में विस्तार से समझाया जाता है, ताकि वह नए चेहरे को आत्मविश्वास के साथ स्वीकार कर सके।

अगर यह सर्जरी सफल रहती है, तो भारत एशिया में मेडिकल इनोवेशन के नए शिखर पर होगा। यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों के लिए उम्मीद की नई शुरुआत होगी, जो किसी हादसे के बाद समाज से नजरें मिलाने में हिचकते हैं। एम्स की यह पहल साबित करती है—अब सिर्फ तकदीर नहीं, सूरत भी बदली जा सकती है।

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