मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था इस वक्त एक बड़े ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। प्रदेश के करीब डेढ़ लाख सरकारी शिक्षकों के लिए आने वाला समय अग्निपरीक्षा जैसा होने वाला है। बरसों से स्कूलों में नौनिहालों का भविष्य संवारने वाले इन शिक्षकों की रातों की नींद अब अपनी खुद की नौकरी बचाने की चिंता में उड़ गई है।
विवाद की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का वह निर्देश है, जिसके बाद राज्य सरकार ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य कर दिया है। सरकार के इस कदम ने उन शिक्षकों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है, जो पिछले 20 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
पूरे प्रदेश में इस फैसले के खिलाफ आक्रोश और हताशा का माहौल है। शिक्षक सड़कों पर उतरकर मंत्रियों और कलेक्टरों को ज्ञापन सौंप रहे हैं। भोपाल के जहांगीराबाद स्थित प्रदेश के पहले सीएम राइज स्कूल (सांदीपनी विद्यालय) से आई तस्वीरें शिक्षकों के संघर्ष की कहानी बयां कर रही हैं। यहाँ शिक्षक जनगणना जैसे महत्वपूर्ण सरकारी कामों और स्कूल की कक्षाओं के बीच समय निकालकर खुद लाइब्रेरी में किताबों से जूझ रहे हैं।
आंदोलनकारी शिक्षकों ने सरकार के सामने स्पष्ट रूप से अपनी मांगें रखी हैं जैसे अनुभवी शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा की शर्त को तुरंत खत्म किया जाए। 20 वर्षों की वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर शिक्षकों के पद सुरक्षित किए जाएं। राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में शिक्षकों के पक्ष को पूरी मजबूती के साथ रखे।
इस संकट पर स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने स्थिति स्पष्ट करते हुए गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दी है। उन्होंने साफ कहा कि यह राज्य सरकार का मनमाना फैसला नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है, जिसका पालन करना संवैधानिक मजबूरी है।
सड़कों पर प्रदर्शन से समाधान नहीं निकलेगा। शिक्षकों को राहत के लिए न्यायालय का ही दरवाजा खटखटाना चाहिए। हालांकि, मंत्री ने यह आश्वासन भी दिया है कि सरकार विधि विभाग से सलाह ले रही है और पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर करने के विकल्पों पर विचार कर रही है।
अब इन शिक्षकों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। अपनी मांगों को मनवाने के लिए आगामी 18 अप्रैल को राजधानी भोपाल में एक विशाल आंदोलन और ‘मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा’ निकालने की तैयारी है।
अब देखना यह होगा कि क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इन ‘गुरुजी’ की गुहार सुनकर कोई बीच का रास्ता निकालते हैं, या फिर नियमों और कानूनी दांव-पेंच के बीच डेढ़ लाख परिवारों का भविष्य अंधकार में घिर जाएगा।