ट्रंप का बड़ा फैसला: अमेरिका 66 वैश्विक संस्थाओं से बाहर, चीन को मिला मौका…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। उन्होंने अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने का आदेश दिया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी कई संस्थाएं और भारत-फ्रांस के नेतृत्व वाली इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने इन संस्थाओं को “अनावश्यक” (redundant) और अमेरिकी हितों के विपरीत बताया है। यह फैसला अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसे को “ग्लोबलिस्ट एजेंडा” पर खर्च होने से बचाने का हिस्सा है।
The Indian Express की रिपोर्ट  के अनुसार ,है कि इन संगठनों में क्लाइमेट चेंज, लेबर, माइग्रेशन, ह्यूमन राइट्स और रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़े कई बॉडीज हैं। ट्रंप प्रशासन इन्हें “रैडिकल क्लाइमेट पॉलिसी” और “वोक एजेंडा” को बढ़ावा देने वाला मानता है। प्रमुख उदाहरणों में UNFCCC (यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज), IPCC, IRENA और ISA शामिल हैं। ISA भारत की महत्वाकांक्षी पहल है, जो सौर ऊर्जा को बढ़ावा देती है, और इसका मुख्यालय गुरुग्राम में है। अमेरिका का बाहर निकलना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि इससे फंडिंग और लीडरशिप पर असर पड़ेगा।
दिल्ली के आकलन के मुताबिक, अमेरिका के इस कदम से इन संस्थाओं में फंडिंग की कमी आएगी और लीडरशिप में वैक्यूम बनेगा। इससे चीन को बड़ा फायदा होगा। चीन अपनी आर्थिक ताकत, संसाधनों और प्रभाव का इस्तेमाल कर इन संगठनों में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है। पहले भी ट्रंप ने WHO, UNESCO और पेरिस एग्रीमेंट से अमेरिका को बाहर निकाला था, जिससे चीन ने वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका बढ़ाई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिकी अलगाववाद वैश्विक शासन में चीन के प्रभुत्व को बढ़ावा देगा।
ट्रंप का यह फैसला उनकी दूसरी टर्म में multilateralism के खिलाफ सबसे बड़ा झटका है। इससे क्लाइमेट एक्शन, हेल्थ और डेवलपमेंट जैसे मुद्दों पर वैश्विक सहयोग कमजोर हो सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह दोहरा प्रभाव डालेगा – एक तरफ अमेरिकी दबाव से राहत, दूसरी तरफ चीन के बढ़ते प्रभाव की चिंता। कुल मिलाकर, यह वैश्विक व्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत है, जहां अमेरिका अपनी संप्रभुता को प्राथमिकता दे रहा है। 
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