“राइट टू डिसकनेक्ट” बिल एक ऐसा प्रस्तावित कानून है जो कर्मचारियों को काम के घंटों के बाद दफ़्तर से जुड़े कॉल, ईमेल या मैसेज का जवाब न देने का अधिकार देता है। आधुनिक डिजिटल जीवन में कर्मचारियों से हर समय संपर्क किया जाना आम हो गया है, जिससे उनका निजी समय प्रभावित होता है। यह बिल उसी समस्या को हल करने का प्रयास करता है।इस बिल का मुख्य उद्देश्य काम और निजी जीवन के बीच संतुलन स्थापित करना है। कई कर्मचारियों को लगता है कि वे 24×7 उपलब्ध रहने के दबाव में रहते हैं, जिससे तनाव, थकान और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। “राइट टू डिसकनेक्ट” उन्हें अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने की आज़ादी सुनिश्चित करता है।
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बिल के अंतर्गत कंपनियों पर यह ज़िम्मेदारी होगी कि वे काम के तय घंटों के बाद कर्मचारियों से अनावश्यक संपर्क न करें। साथ ही, कंपनियों को स्पष्ट नीतियाँ बनानी होंगी जो बताएँ कि किस परिस्थिति में आफ्टर-ऑवर्स संपर्क उचित है और कब नहीं। इससे कार्यस्थल के नियम पारदर्शी और न्यायसंगत बनते हैं।यह बिल कर्मचारियों की उत्पादकता पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। जब व्यक्ति पर्याप्त आराम करता है और मानसिक रूप से तरोताज़ा रहता है, तो वह काम पर अधिक ध्यान, रचनात्मकता और ऊर्जा के साथ लौटता है। इससे कर्मचारियों और संगठनों दोनों को फायदा होता है।
कई देशों में इस तरह के क़ानून पहले से मौजूद हैं, जैसे फ्रांस और इटली। भारत में यह विचार अभी चर्चा और प्रस्ताव के चरण में है, लेकिन इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है, क्योंकि अधिक लोग डिजिटल ओवरलोड और लगातार उपलब्ध रहने के दबाव के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं कुल मिलाकर, “राइट टू डिसकनेक्ट” बिल आधुनिक कार्य संस्कृति में कर्मचारियों के अधिकारों और मानसिक कल्याण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। यह बताता है कि काम महत्वपूर्ण है, लेकिन निजी जीवन और आराम उतने ही आवश्यक हैं, और इन दोनों के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाए रखना हर कर्मचारी का अधिकार होना चाहिए।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने शुक्रवार को लोकसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। इसमें कर्मचारियों को ऑफिस के समय के बाद काम से जुड़े फोन और ईमेल को नजरअंदाज करने का कानूनी अधिकार देने की मांग की गई है।उन्होंने लोकसभा में शुक्रवार को यह बिल पेश किया, जिसका नाम राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025 है। इस बिल में कर्मचारियों के वेलफेयर अथॉरिटी बनाने की मांग की गई है, ताकि अगर उन्हें यह अधिकार दिया जाता है, तो वे ऑफिस के समय के बाद या छुट्टियों में काम से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन को सुनने के लिए कानूनी तौर पर मजबूर न हों।
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