राम रहीम को फिर पैरोल: रसूखदारों पर नरमी और न्याय व्यवस्था पर सवाल

भारत का संविधान डंके की चोट पर कहता है कि कानून की नजर में देश का हर नागरिक बराबर है, चाहे वह सड़क पर झाड़ू लगाने वाला आम आदमी हो या फिर लाखों की भीड़ को नियंत्रित करने वाला कोई रसूखदार। लेकिन क्या जमीनी हकीकत भी यही है? यह सवाल आज देश के हर उस नागरिक के जेहन में खटक रहा है जो अदालतों के चक्कर काटते-काटते थक चुका है। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर मिली पैरोल ने इस कानूनी बहस को दोबारा जिंदा कर दिया है कि क्या भारत में सजा का पैमाना चेहरे और रसूख को देखकर बदल जाता है?

साल 2017 में सीबीआई की विशेष अदालत ने दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में राम रहीम को 20 साल की बामुशक्कत सजा सुनाई थी। इसके बाद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में भी उसे उम्रकैद की सजा मिली। अपराध जघन्य था, लेकिन सजा के बाद का रिकॉर्ड न्याय व्यवस्था के माथे पर सिलवटें ला देता है।

राम रहीम को पिछले कुछ सालों में 15 से अधिक बार पैरोल और फरलो मिल चुकी है। अगर कुल दिनों का हिसाब लगाया जाए, तो वह 400 से ज्यादा दिन सलाखों के बाहर, खुली हवा में बिता चुका है। पैरोल पर बाहर आते ही राम रहीम ऑनलाइन सत्संग करता है, उसके म्यूजिक वीडियो और गाने रिलीज होते हैं, और राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग उसके सामने वर्चुअली शीश नवाते नजर आते हैं।

आलोचक और कानूनविद लगातार पूछ रहे हैं कि जब-जब किसी राज्य में चुनाव नजदीक आते हैं, तब-तब राम रहीम की पैरोल की टाइमिंग इतनी सटीक कैसे बैठ जाती है? क्या राजनीतिक लाभ और समर्थकों की भारी भीड़ न्याय की संवेदनशीलता को तय करेगी?

आसाराम: \’मेडिकल ग्राउंड\’ बनाम सिस्टम की दोहरी नजर

नाबालिग से बलात्कार के मामले में जोधपुर जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम बापु का मामला भी कम चौंकाने वाला नहीं है। बढ़ती उम्र, दिल की बीमारी और सांस लेने में तकलीफ जैसे \’मेडिकल ग्राउंड\’ के आधार पर आसाराम को भी समय-समय पर राहत मिलती रही है।

कानून के मुताबिक, हर बीमार कैदी को इलाज का हक है। लेकिन सवाल तब उठता है जब देश की जेलों में बंद उन हजारों बुजुर्ग और गरीब कैदियों की याद आती है, जो गंभीर बीमारियों से जूझते हुए भी एक अदद जमानत के लिए तरस जाते हैं। कई तो बिना सुनवाई और बिना इलाज के ही जेल के भीतर दम तोड़ देते हैं। ऐसे में हाई-प्रोफाइल बाबाओं के लिए सिस्टम की यह \’मानवीय\’ तत्परता सवालिया निशान खड़े करती है।

कुलदीप सेंगर: जब जनता के आक्रोश ने खींची लक्ष्मण रेखा

इन मामलों की तुलना जब उन्नाव रेप केस के दोषी और पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर से की जाती है, तो सिस्टम का एक अलग ही चेहरा सामने आता है। जब कुलदीप सेंगर को अंतरिम जमानत मिली थी, तो देश भर में तीखा विरोध हुआ था। महिला संगठन सड़कों पर उतरे, मीडिया में बहस हुई और आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) को हस्तक्षेप करना पड़ा।

आखिर रसूखदारों के मामलों में यह फर्क क्यों?

  1. \’धर्म\’ और वोट बैंक का सुरक्षा कवच: राम रहीम और आसाराम सिर्फ कैदी नहीं हैं, बल्कि बड़े धार्मिक साम्राज्यों के मुखिया रहे हैं। उनके पीछे करोड़ों अंधभक्तों की भीड़ है, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए बड़ा वोट बैंक है। यही कारण है कि राजनीतिक वर्ग इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने से हिचकिचाता है।

  2. भीड़ का चरित्र: कुलदीप सेंगर एक राजनीतिक अपराधी था, इसलिए समाज का गुस्सा उस पर खुलकर निकला। लेकिन जब अपराधी \’धार्मिक चोगे\’ में होता है, तो समाज का एक बड़ा हिस्सा नागरिक से \’भक्त\’ बन जाता है और अपराधियों पर तीखापन कमजोर पड़ जाता है।

  3. सिस्टम का \’प्रभाव\’ से प्रभावित होना: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि देश की जेलों में बंद लगभग 70% कैदी \’अंडरट्रायल\’ (विचाराधीन) हैं, जिनके पास अच्छे वकील या जमानत के पैसे नहीं हैं। वहीं, रसूखदारों के लिए आधी रात को भी अदालतें खुल सकती हैं और कानून की व्याख्याएं बदल दी जाती हैं।

यह लड़ाई किसी एक बाबा, एक नेता या किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। यह लड़ाई उस भरोसे की है जिसके दम पर यह लोकतंत्र टिका हुआ है। अगर प्रभावशाली लोग अपने रुतबे, पैसे और भीड़ के दम पर बार-बार जेल से बाहर आकर खुली हवा का आनंद लेंगे, और गरीब कैदी न्याय की आस में सलाखों के पीछे बूढ़ा हो जाएगा, तो जनता के मन में यह धारणा पक्की हो जाएगी कि भारत में कानून की किताब तो एक है, लेकिन उसका न्याय सबके लिए अलग-अलग है। और किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह सबसे खतरनाक मोड़ है।

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