पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय पर्दे के पीछे एक बड़ा सियासी ड्रामा आकार ले रहा है। तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े चेहरों, खासकर राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने की अटकलों ने राज्य से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। लेकिन इस संभावित दलबदल ने खुद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर एक नई दुविधा को जन्म दे दिया है।
सवाल बड़ा है— क्या चुनाव जीतने के बाद अब बीजेपी उन टीएमसी नेताओं के लिए रेड कारपेट बिछाएगी, जिनके खिलाफ उसने मोर्चा खोला था? इस सुगबुगाहट के बीच पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कड़े और साफ शब्दों में अपनी ही पार्टी के भीतर और बाहर एक बड़ा संदेश दे दिया है।
भट्टाचार्य ने दोटूक कहा कि बीजेपी कोई धर्मशाला नहीं है कि जो भी यहाँ आएगा, उसे जगह दे दी जाएगी। जिन्होंने हमारे कार्यकर्ताओं की हत्या की, जिन्होंने युवाओं की नौकरियाँ छीनीं और आम जनता को लूटा, उन्हें हम गले कैसे लगा सकते हैं? बंगाल की जनता ने इन्हीं भ्रष्टाचारियों के खिलाफ हमें वोट दिया है। ऐसे में इन्हें पार्टी में शामिल करने का सवाल ही नहीं उठता। भले ही प्रदेश नेतृत्व कड़े तेवर दिखा रहा हो, लेकिन दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिक हलकों में टीएमसी के भीतर एक बड़ी टूट की स्क्रिप्ट लिखे जाने की चर्चा आम है।
लोकसभा में टीएमसी के 29 और राज्यसभा में 10 सांसद हैं। सूत्रों के मुताबिक, राज्यसभा के 10 में से 8 सांसद बीजेपी के संपर्क में हैं और जल्द ही पाला बदल सकते हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि जिस तरह हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद अचानक बीजेपी में शामिल हो गए थे, ठीक वैसा ही कुछ टीएमसी के साथ भी दोहराया जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी फिलहाल \’वेट एंड वॉच\’ की नीति पर चल रही है। प्रचंड बहुमत के उत्साह में अभी वह दागी नेताओं को एंट्री देकर अपनी छवि खराब नहीं करना चाहती, लेकिन यह रुख कब तक रहेगा, इस पर सस्पेंस है। अगले साल बंगाल में पंचायत और नगर निगम के चुनाव होने हैं। जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने के लिए बीजेपी को स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरों की जरूरत पड़ेगी।
हालांकि समिक भट्टाचार्य और दिलीप घोष जैसे दिग्गज नेता कट्टर आरएसएस (RSS) पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन यह भी सच है कि बीजेपी के मुख्यमंत्री पद का चेहरा (या प्रमुख नेता) शुभेंदु अधिकारी खुद टीएमसी के ही \’बाय-प्रोडक्ट\’ हैं। ऐसे में राजनीति की व्यावहारिक जरूरतें बीजेपी को अपने बंद दरवाजे नहीं, तो कम से कम एक \’खिड़की\’ खोलने पर मजबूर जरूर करेंगी।
इस पूरी सियासी हलचल के पीछे टीएमसी की आंतरिक कमजोरी भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। बंगाल की मौजूदा स्थिति को देखें तो तृणमूल में बड़ी टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाल के दिनों में ममता बनर्जी ने जब भी विधायकों और पार्टी नेताओं की समीक्षा बैठक बुलाई, कई बड़े नाम नदारद रहे। यह बगावत का पहला संकेत है। चुनाव में करारी हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल तो टूटा ही है, साथ ही ममता बनर्जी का खुद अपनी सीट से चुनाव हार जाना पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ है। इससे ममता का \’अजेय\’ होने का भ्रम टूट गया है।
टीएमसी नेताओं में इस समय डर का माहौल है। उन्हें डर है कि केंद्र और राज्य में मजबूत स्थिति में आई बीजेपी अब उन पर कानूनी और राजनीतिक शिकंजा कसेगी। इस संभावित कार्रवाई से बचने के लिए कई नेताओं को बीजेपी की शरण में जाने के अलावा कोई सुरक्षित रास्ता नहीं सूझ रहा है।
आने वाले दिन पश्चिम बंगाल की राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे। एक तरफ जहां बीजेपी अपनी वैचारिक शुद्धता और चुनावी मजबूरी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी के सामने अपनी पार्टी को एकजुट रखने और \’इंडिया गठबंधन\’ में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने की दोहरी चुनौती है। अब देखना यह है कि क्या ममता इस चक्रव्यूह को भेद पाती हैं या बीजेपी बंगाल में एक नया \’पॉलिटिकल गेम\’ करने में कामयाब होती है।