ईरान में बिगड़ते हालात: इंटरनेट ब्लैकआउट और अल-रसूल मस्जिद में आग!

ईरान में जनवरी 2026 की शुरुआत से ही स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। 28 दिसंबर 2025 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब पूरे देश में फैल चुके हैं। शुरुआत आर्थिक संकट, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ हुई थी, लेकिन अब ये प्रदर्शन इस्लामी गणराज्य के शासन को उखाड़ फेंकने की मांग में बदल चुके हैं। लोग “तानाशाह मुर्दाबाद”, “आजादी” और “खामेनेई नीचे” जैसे नारे लगा रहे हैं।8 जनवरी 2026 की रात को स्थिति और उग्र हो गई। निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के आह्वान पर देश के सभी 31 प्रांतों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। तेहरान, मशहद, इस्फहान समेत 50 से ज्यादा शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। सुरक्षा बलों ने लाइव फायरिंग की, जिसमें दर्जनों मौतें हुईं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार अब तक 45 से 217 तक मौतें हो चुकी हैं (कुछ अनुमान तेहरान के अस्पतालों से 217 का दावा करते हैं)।
सबसे बड़ा कदम सरकार ने उठाया – पूरे देश में इंटरनेट और टेलीफोन सेवाएं पूरी तरह बंद कर दी गईं। NetBlocks जैसी संस्थाओं ने इसे “पूर्ण ब्लैकआउट” बताया। इसका मकसद प्रदर्शनकारियों के बीच संचार रोकना और हिंसा की तस्वीरें दुनिया तक न पहुंचने देना है। अंतरराष्ट्रीय कॉल्स भी नहीं लग रही हैं, जिससे ईरान दुनिया से कटा हुआ लग रहा है।
सबसे चौंकाने वाली घटना तेहरान की अल-रसूल मस्जिद में हुई, जहां प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी। यह मस्जिद धार्मिक और राजनीतिक महत्व की है। आग लगने के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं (हालांकि ब्लैकआउट के कारण सीमित)। यह घटना शासन के खिलाफ गुस्से की गहराई दिखाती है – लोग अब धार्मिक प्रतीकों को भी निशाना बना रहे हैं।
सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों को “ट्रंप के एजेंट” बताकर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ईरान के चीफ जज ने “कोई नरमी नहीं” कहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी खामेनेई को धमकी दी कि “हम जहां सबसे ज्यादा दर्द होगा, वहीं मारेंगे”।यह स्थिति 2022 के “महिला, जीवन, आजादी” आंदोलन से भी बड़ी लग रही है। इंटरनेट बंद होने से सटीक जानकारी मिलना मुश्किल है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान में बड़ा बदलाव आ सकता है। लाखों लोग सड़कों पर हैं, और शासन दबाव में है।
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