नोएडा मजदूर हिंसा: जेल में बंद सत्यम वर्मा मामले में नया मोड़

नोएडा के फेज-2 औद्योगिक क्षेत्र में बीते 13 अप्रैल को हुए हिंसक मजदूर आंदोलन के मामले में एक बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। केस में आरोपी बनाए गए और फिलहाल जेल में बंद पत्रकार सत्यम वर्मा की रिहाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। सत्यम वर्मा की पत्नी ने उनकी गिरफ्तारी और हिरासत को पूरी तरह गैरकानूनी बताते हुए अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दाखिल की है।

इस संवेदनशील मामले पर 18 मई को हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच सुनवाई करेगी।सत्यम वर्मा की पत्नी ने अपने अधिवक्ताओं अंकुर आजाद, शशांक तिवारी और शाश्वत आनंद के माध्यम से यह याचिका दायर की है। याचिका में दलील दी गई है कि वर्मा की गिरफ्तारी और हिरासत कानूनन अवैध है और यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है।

याचिका में अदालत से तुरंत हस्तक्षेप कर अंतरिम राहत (रिहाई) देने की मांग की गई है। इसके साथ ही, मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक बेहद अहम मांग यह की गई है कि घटना और गिरफ्तारी से जुड़े सभी सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, पुलिस रिकॉर्ड, मूवमेंट रजिस्टर, ट्रांजिट से जुड़े दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को तुरंत सुरक्षित रखा जाए और उन्हें अदालत के समक्ष पेश किया जाए।

मामले की गंभीरता को देखते हुए इस याचिका में उत्तर प्रदेश सरकार के साथ-साथ कई शीर्ष पुलिस अधिकारियों को प्रतिवादी (पक्षकार) बनाया गया है। इनमें शामिल हैं:

  • उत्तर प्रदेश राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP)

  • लखनऊ के पुलिस आयुक्त और नोएडा के पुलिस आयुक्त

  • लखनऊ के अलीगंज थाने के थाना प्रभारी (SO)

  • नोएडा के थाना फेज-II के थाना प्रभारी

  • कासना जिला जेल के जेल अधीक्षक

आपको बता दें कि बीते 13 अप्रैल को नोएडा के फेज-2 औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों का एक प्रदर्शन अचानक उग्र हो गया था। इस दौरान तोड़फोड़, आगजनी और पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुई थीं, जिसके बाद पुलिस ने एक दर्जन से अधिक मुकदमे दर्ज किए थे। पुलिस ने इस हिंसा की साजिश में भूमिका होने के आरोप में 17 अप्रैल को सत्यम वर्मा को गिरफ्तार किया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने बीते 13 मई को उन पर NSA भी तामील कर दिया, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं।

लखनऊ के रहने वाले 60 वर्षीय सत्यम वर्मा खुद को पत्रकार बताते हैं। हालांकि, पुलिस और जांच एजेंसियों का दावा कुछ और ही है। पुलिस के मुताबिक, वर्मा के बैंक खातों की जांच में विदेशों से करीब 1 करोड़ रुपये के संदिग्ध ट्रांजेक्शन मिले हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस रकम का इस्तेमाल मजदूर आंदोलन को भड़काने और हिंसक गतिविधियों की फंडिंग के लिए किया गया था। फिलहाल एजेंसियां इस वित्तीय एंगल की गहराई से जांच कर रही हैं।

18 मई को होने वाली यह सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण है। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट इस याचिका को स्वीकार करते हुए पुलिस और प्रशासन से जवाब तलब करता है, तो गिरफ्तारी की प्रक्रिया और पुलिस की थ्योरी दोनों ही अदालत की स्क्रूटनी के दायरे में आ जाएंगी। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार भी कोर्ट में एनएसए (NSA) और विदेशी फंडिंग के पुख्ता सबूत पेश कर अपनी कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश करेगी। कानून के जानकारों का मानना है कि इस सुनवाई के फैसले का असर इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।

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