बिहार के अजेय मुख्यमंत्री, ‘साहब’ अचानक राज्यसभा जाने का फैसला करते हैं, जिससे एक भीषण सत्ता संघर्ष शुरू हो जाता है। एक तरफ बीजेपी अपना मुख्यमंत्री चाहती है, दूसरी तरफ ‘साहब’ अपने निशांत बेटे को राजनीति में उतारकर अपनी विरासत बचाना चाहते हैं, और तीसरी तरफ विपक्ष इस टूट का फायदा उठाने के लिए तैयार बैठा है।
बिहार की सियासत में पिछले 20 सालों का यह सबसे बड़ा ‘यू-टर्न’ आने वाला है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब राज्यसभा में की खबरों ने न सिर्फ पटना के ‘अणे मार्ग’ बल्कि दिल्ली के ‘साउथ ब्लॉक’ में भी खलबली मचा दी है। इसे नीतीश कुमार का ‘रिटायरमेंट’ नहीं, बल्कि 2029 के लिए बीजेपी-जेडीयू का सबसे बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ माना जा रहा है।
सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार सिर्फ राज्यसभा सांसद बनकर नहीं रहेंगे। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार में उन्हें बड़ा मंत्रालय (संभवतः रेल या कृषि) या NDA का नेशनल कन्वीनर बनाया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पहली बार बिहार में बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता साफ हो जाएगा। वहीं नीतीश कुमार को भी एक फायदा होगा वह एक ‘क्लीन इमेज’ के साथ राष्ट्रीय राजनीति में वापसी करेंगे।
इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला मोड़ है नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की एंट्री। अब तक लाइमलाइट से दूर रहने वाले निशांत को जेडीयू के ‘भविष्य’ के रूप में पेश किया जा रहा है। कैबिनेट मंत्री विजय चौधरी का बयान गौर करें तो वह कहते हैं कि “कार्यकर्ता चाहते हैं निशांत राजनीति में आएं”—यह साफ संकेत है कि जेडीयू अब ‘परिवारवाद’ के उसी रास्ते पर है जिस पर वह कल तक हमलावर थी।
नीतीश कुमार अपने वोट बैंक (EBC, महिला, लव-कुश) को किसी बाहरी नेता के बजाय अपने खून के रिश्ते को सौंपना चाहते हैं ताकि जेडीयू में टूट न हो।
बिहार में 2025 के चुनाव के बाद जो समीकरण बने हैं, उनमें नीतीश की पकड़ कुर्मी-कोइरी और EBC वोटरों पर आज भी कायम है। अगर नीतीश दिल्ली जाते हैं, तो क्या यह वोट बैंक बीजेपी की ओर शिफ्ट होगा? क्या तेजस्वी यादव इस ‘वैक्यूम’ का फायदा उठाकर अति-पिछड़ों को साध पाएंगे?
जानकारों का मानना है कि निशांत कुमार को आगे करना दरअसल इसी वोट बैंक को एकजुट रखने की एक ‘इमोशनल चाल’ है। नीतीश के जाने के बाद बीजेपी बिहार में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में तो आ जाएगी, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा या कोई नया चौंकाने वाला नाम? बीजेपी के भीतर सीएम पद की रेस पार्टी के लिए सिरदर्द बन सकती है। वहीं चिराग पासवान और मांझी जैसे सहयोगी दल भी इस बदलाव के बाद अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का दबाव बनाएंगे।
“नीतीश कुमार कभी बिना तैयारी के कदम नहीं उठाते। अगर वो दिल्ली जा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि पटना की चाबी उन्होंने पहले ही सुरक्षित कर ली है। यह बिहार की राजनीति का ‘क्लाइमेक्स’ नहीं, बल्कि एक नए सीजन का ‘ट्रेलर’ है।” — अगले 48 घंटे बिहार की राजनीति के लिए निर्णायक हैं। क्या निशांत कुमार कैबिनेट में शामिल होंगे? क्या बीजेपी अपना मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करेगी? नजरें राजभवन की हलचल पर टिकी हैं। आपकी क्या राय है? क्या निशांत कुमार बिहार की कमान संभालने के लिए तैयार हैं? कमेंट में बताएं।