रास्ते में खत्म हुई ऑक्सीजन और तड़प-तड़प कर मर गया किसान!

सरकारी दावों और स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता ने एक बार फिर एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया है। रामपुर में मानवता को शर्मसार करने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जहाँ एक घायल किसान को बचाने के लिए बुलाई गई एम्बुलेंस ही उसकी मौत का सबब बन गई। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि ‘सिस्टम द्वारा की गई हत्या’ है।

घटना रामपुर के थाना पटवाई क्षेत्र की है। अहमदनगर निवासी किसान कुलदीप सिंह सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। परिजनों ने आनन-फानन में उन्हें जिला अस्पताल पहुँचाया, जहाँ से उन्हें मुरादाबाद (हायर सेंटर) रेफर कर दिया गया। अस्पताल के बाहर से एक प्राइवेट एम्बुलेंस बुलाई गई, लेकिन परिजनों को क्या पता था कि वे मदद नहीं, बल्कि काल को बुला रहे हैं।

जैसे ही एम्बुलेंस आगे बढ़ी, मरीज की सांसे उखड़ने लगीं। पता चला कि एम्बुलेंस में ऑक्सीजन ही खत्म होने वाली है। जब किसान जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहा था, तब एम्बुलेंस चालक गाड़ी रोककर परिजनों से डीजल के पैसों के लिए बहस कर रहा था।मदद की गुहार और पैसों की जद्दोजहद के बीच वक्त निकलता गया और मुरादाबाद पहुँचने से पहले ही कुलदीप सिंह ने दम तोड़ दिया।

इस रूह कंपा देने वाली घटना के बाद जब सवाल उठे, तो मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. दीपा सिंह का बयान किसी जख्म पर नमक छिड़कने जैसा आया। उन्होंने साफ कहा कि उक्त एम्बुलेंस प्राइवेट थी और स्वास्थ्य विभाग के सीधे नियंत्रण में नहीं आती। अगर एम्बुलेंस प्राइवेट थी, तो क्या जिला अस्पताल के गेट पर मौत का यह धंधा बिना किसी शह के चल रहा है? क्या बिना मानकों की जांच किए इन एम्बुलेंसों को मरीजों की जिंदगी से खेलने का लाइसेंस दे दिया गया है?

मामला बढ़ने पर सीएमओ ने कहा है कि एआरटीओ (ARTO) से जानकारी मांगी जाएगी कि ये एम्बुलेंस किसके नाम पर रजिस्टर्ड हैं और किन अस्पतालों से जुड़ी हैं। मानकों का पालन न करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही गई है। लेकिन सवाल वही है कि क्या यह जांच उस किसान को वापस ला पाएगी? क्या उन ‘सफेदपोश’ एम्बुलेंस माफियाओं पर नकेल कसी जाएगी जो बेबस मरीजों की सांसों का सौदा करते हैं?

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